आज मेरा मन एक वातानुकूलित शोरूम में जाने का हुआ। मैने शोरूम में कुछ देर इधर उधर घूमा एक दो वस्तुओं के दाम पूंछे उसी गुणवत्ता की छोटी दुकान से लगभग तीस प्रतिशत अधिक मूल्य बताया। मैने कहा क्यों भाई यह चीज तो इतने की मिलती हैं। सेल्स मैन ने तुरन्त उत्तर दिया भाई यहां नहीं मिलेगी किसी फुटपतिया दुकान में मिलेगी।
मै भी कहां पीछे रहने वाला मैने तुरन्त दूसरा सवाल दाग दिया क्या इस शोरूम में आ जाने के बाद कोई वस्तु की गुणवत्ता बढ़ जाती है। जो आप उसे मंहगा कर बेच रहे हो ।
दुकानदार ने तुरन्त कहा कि इस शोरूम के मेन्टेनेंस का खर्च कहाँ से आयेगा?
मैने- तो क्या यह शोरूम लोगों को नौ की चीज नब्बे की देने के लिए खोला है।
कहने का मतलब कोई वस्तु दुकान में रहने या शो रूम में रहने से उसकी गुणवत्ता नही बदलती।
अगर कुछ बदलता है तो यह हमारा दृष्टिकोण--
इसी दृष्टिकोण को बदलना विद्यालय और विज्ञापनों ने किया और लोगों की आत्मनिर्भरता छीन पराश्रित किया गया। आज विद्यालयों से ऐसी शिक्षा दूर कर दी गई जिससे बच्चे परिश्रमी, लगनशील, जिम्मेदार, अनुशासित और नैतिकता विहीन बन लहे है।
मै एक और छोटा सा उदाहरण अपने बेटे सम्यक नागाल्यायन का देता हूँ, जो कक्षा तीन में पढ़ता है । एक दिन विद्यालय से
बच्चे को होमवर्क के रूप में पुस्तक के कुछ चित्र फोटोकापी कराने को दिया गया। बच्चे ने अपनी मैडम की आज्ञानुसार मुझसे फोटो कापी कराने की बात कही मैने अपने बच्चे को कई बार समझाने का प्रयास पर बच्चा तो बच्चा है, वह कहाँ मानने वाला, जिद करने लगा, तो मैने कहा कि लाओ यह चित्र मै तुम्हे बनाना सिखाये देता हूँ। पर वह मेरी एक न सुनी। मैने भी जिद पकड़ ली कि मै भी फोटोकॉपी नही कराऊंगा।
दूसरे दिन मै विद्यालय पहुंचा और मैडम से कहा कि आपने बच्चों को जो फोटोकापी कराकर लाने का कार्य दिया है, उससे बच्चे ने क्या सीखा?
मैडम भी सीधे साधे रूप में जवाब दिया कि पुस्तक में नोट लगा है कि कापी एण्ड पेस्ट इसलिए दिया है।
फिर मैने कहा कि आप अध्यापिका है कापी एण्ड पेस्ट से बच्चे ने क्या सीखा और उसके मस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? मै जो पोस्टग्रेजुएट थी वही 23-24 वय की होगी। निरुत्तर दिखी।
सवाल मेरा फोटोकॉपी का नहीं था उसके प्रभाव का था।
उक्त दोनों उदाहरण दृष्टिकोण से जुड़े है। हम अपने बच्चों की इस तरह की छोटी मोटी बातों को ध्यान नहीं देते बल्कि पढ़ाई के नाम पर जो बच्चो टूल बनाया जा रहा है उसे तो समझना बहुत दूर की बात है। हमे इस तरह की घटनाओं या बातों को नजरअंदाज करना ही हमारे बच्चों को गैरजिम्मेदाराना बनाते है।
हमारी इन्द्रियों को नियंत्रित करने माध्यम है शोरुम न कि गुणवत्ता पूर्ण सामग्री उपलब्ध कराना।
धन्यवाद!
स्वामी संबोधि आनंद।
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